الأحد، 28 أبريل، 2013

التاسعه



وكان  يوماً   لا  ينافسه   صعوبه   وأنا  أرى  اخي  يُهااان   أمامي   ...اعترف   او  سلبنااااك  حياتك   حينها  فقط  أدركت  أن  المووت   الذي   طالما   خفته  ,   أنه  نعمه  ونعمه  كبيرة   أمووت  بس  أموت فلسطيني   ولستً  بخائن  ...

لم  يكن  بوسعنا  انقاذه  وهذا  الشرار  في  عيناااي   لمحه   أحدهم   ,   فحاول  مجاراتي   لتلك  النظره  ولكنه  لم   يفلح   فأخذت  قضبااان  الزنازين   تصفر  وكأنها  تدوي  انذااراً    عاجلاً  ...  حينها   فقط   أدركت   أنهم   يخافوننا   والا   لما  تراجعوا  مبعدين  أيدهم  النجسه  عنه  ... ولكنه   آثر  الموت   ويبدو   أنه   تمناااها    على  أن   يفقد    ماء  وجهه   أمام  وطنه   ,  في  صباح  اليوم   التالي  ...أعلن  خبر  وفاااته   ...   أولى   علامات  الوطنيه  بداخلي  ولدت   لم   أكن  حينها   أدرك  هذا  المعنى  ,  كنتُ  الشاب   الطائش    الذي  يهتم   بمظهره   وبرفقة  الفتيات   وأحياناً   أتثاقل  على  الصلاة فلا أصليها   وكأن  هذه  الدنيا   جنتي  ووحدي ...!


في هذا  اليوم  بالذاات    وردني   أن  أمي   في  زيارة  لي   لم   أكن  حينها  على   قدر   الاشتيااق  اليها     ,  فبالي  مشغوول   وكأن  أعاصير   جديدة    تجتاحني  رغماً   عني   وهل  بمقدوري  استيعاب   ما    رأيته  لتوي....!


كلمتني   أمي  وبدت   حزينه  والارهاااق   يملأ   وجهها   فقلتُ   لها  : 
-  ما بالك  أمي...؟
قالت  لي   وهى  تحاول  تمالك   نفسها     ..:
- بني   ...  خطيبتك    تريد   أن  ترى   مستقبلها  ...  وقبل   أن  تكمل  أوقفتها   وأنا   أمسح   بدموعها    قائلاً   :
-  دعيها   ...  فأنا   مكاني  هنا  ..!

نظرت   الي   أمي  وكأنها   تراني   للمرة   الأولى  ...عزيزي!   ستخرج    عاجلاً   أم  آجلاً  ..

قلتُ   لها   :  -  أمي  هنا   أتلقى   دروساً   لو  أنني  في  الجامعه   لم  اتعلمها   ...


غااادرت   أمي  وكااادت  عيناااي   تتفجر   من  الحرقه  والغيظ   ...  ما اعتبرتها   حياتي   كلها   تريد   أن  ترتبط  بآخر   وتتركني   فهي  لا  تتحمل    من  أجلي  ....   حينها  فقط   أدركت   أن  الحب  الذي   بيننا   زائف  وعلي   بغسله   جيداً   من   قلبي   ...  مسحتُ    دموعي     ورفعتُ   رأسي   الى   السماااء    شاهقاً    أنفااااسي   ....   حبيبتي   الأبديه   فلسطين    ولا  أريد   مقابل   ....



الى اللقااااء   بكل  الحب   ....♥



الخميس، 7 مارس، 2013

الحلقة الثامنه ...

صورة: ‏والله شامخين اعلى من كل الجبال‏


في منتصف الليل  وكنتُ  مستغرقاً  في  النوم  على غير  عادتي   ...  جاءني  ذلك الوحش   الخائف  يشدني هو  وخمسه  جنود  معه  الى غرفة التعذيب  وكانوا  يصرخون  علي  بالعبريه  لم  أفهم  شيئاً  ولكنني  كنتُ  هلعاً   نعم  أعترف  لأنهم  باغتوني  فجأة   حينها  فقط  أدركت  أن  تعلم  العبريه  أمر  ضروري 

أخذوا  ينهالوا   علي بالضرب  ويسألونني  عن  أمر  ما  ولكنني  لا  أعرف  العبريه   حتى   تحدثت   اليهم   بالانجليزيه   وأنا  أصرخ  فاقترب   مني
أحدهم  وكنتُ  معصب العينين  لا حول  لي ولا  قوة   وقال :
"  اعترف    الى  أي  حركة  تنتمي أنت   ؟  واعلم جيداً  أننا  سنفقدك  رجولتك   ان  لم   تتحدث الينا ...!"

لم أعر   اهتمامي  الى  كلماته  تلك  بقدر  ما أنا  أميز  هذا  الصوت  وبدقه ...فاقتر ب  مني أكثر وقال :" ما رأيك؟"
قلتُ  له  :  "  لا أخافك   ...   ولا  أراك  أيها  الجبان  "

فما رأيت  الا  والضربات  تعلم  على  جسدي   وأنا  مازلتُ  معصب العينين   فأغمي  علي  من شدة  الضرب  ...  ولم  أفق  الا  وهم  يتحدثون   عن  هذا المدلل   من جديد  وأن  هناك  صفقه   ستعقد  عما   قريب   بالمناسبه   كانوا  يظنوني   ما زلت   مغشي علي   فكانوا  يتحدثون العربيه  حينها  فقط تأكدت  أن  هذا  الشاااذ   دسيس  علينا   ويوجد  غيره  أيضاً  

ولكنني    واصلت   الانصااات   اليهم  حتى  سمعت  "  شاليط  ..!"

لحظه ! الم  يكن هذا  الأسير    الذي  تم   حبسه   من  قبل  المقاومه  الفلسطينيه    وهو   من انهلع   الصهاينه   خوفاً   على   نفوس  جنودهم   ان  لم  يستعيدوووه   باكراً  ...!


أوووه  ... اذن  هذا   المدلل  الذي    كانوا   يتحثون   عنه  ....

الى اللقااااء   بكل الحب...♥

الأربعاء، 6 مارس، 2013

الحلقة السابعه ...






لا  أعلم  لما  تذكرتُ  كل تلك القوة   التى    تملكت  أمي  لحظة  وجدتني  أغرق   في احدى  المستنقعات  القريبه  من  بيتنا   وأذهلتني  تلك  الارادة  بدخلها     ...   وكادت   تموت   بالفعل  أنا  رأيتُ  أمي   تُقدم  على الموت   بكل ارادتها      فارتميتُ  في  أحضانها  ألهث   ضميني  ..  ضميني  ...  ولا تتركيني  ..!


في هذا  الظلام  وعلى هذا  الفراش  الرديء  اليوم  أنا  في الزنزانه  وكل  أحلامي  بقلبي  تتوق   للتحليق   وكوني  أسيراً  لن  يجعلني  أعترف   بعجزي   ...  فلستُ  عاجزاً  فأنا   الحر  وان متُ   صارخاً   فلن  أموت  الا وأنا  أقتااااات   من لحم   كتفي ....

تراءت  أمامي  صورة أمي  مرة  أخرى  ولوحت  لي من  بعيد    فكرة جديدة  وأستغرب  لماذا   كل تلك الأفكااار  ولدت   لدي  فور  دخولي هنا   ...   !

وقطع  حبل  أفكاار  صوتاً   ضخماً   فتّّت   كل  خيالاتي  ناهضاً   نفسي  بالمثول  أمامه   وفي التو   معاملتهم  لنا  رغم   وحشيتها   شعرتُ  بأنه   يخافني  وكلما  نظرتُ  الى  عينا  هذا  السّجااان  الضخم   ارتأت   الى  حلقه   لعابه   يبلعه   ...  فارتفعت   احدى  حاجباااي   استغرباً   وامتلأ   صدري   عزة  ونصراً  ...

واغتاااظ  أكثر    حين  تأكّد  أنني  لمحت  خوفه  حينها  تذكرتُ  أمي  وهي تقول  :
" هذا العدو   بني!....  يخافنا  رغم  سلاحه  ...!"

لم أصدق   أمي   حينها    لأنني كنتُ  مؤمن   بقوة  السلاح   التى  تجعل  مالكها  وحاملها    أقوى  من أي  أحد   ...  ولكنني  اليوم  أصدق   أمي  ...  كثيراً  ..

وصلت الى المحكمة  في هذه الأوقااات   فرأيتُ   القاضي  أمامنا  ينطق   بحكم   كل  منا  ,  وحين  جاء  دوري   تحمستُ  كثيراً 
فقال" حُكم  عليك   ب  24    سنه     قابله  للتعديل  "

فرأيتُ  نفسي  أبتسم   ...  رويداً   رويداً   فصرختُ  دون درايه   مني  ...

الله   أكبر ...   الله  أكبر 


حينها   قرأت  علامات  التعجب على  وجوووه   الجميع  
ولكنني   ضللت  أرددها   ... الله أكبر ... الله  أكبر 

وحين  سألني  أحد  زملائي  عن  السبب   قلت  له   بقوة   وااازت   قوة  أمي وهي  تحميني    صغيراً 
" بقدر ما يحكمون علي ....  هم  يخافوني ...!"


زميلي لم  يصدقني  وأجزم  على أني   مجنون  ولكنني   بتُ  أؤمن  بتلك  الفكرة    واشتقتُ  الى حضن  أمي  كثيراً  ....


الى اللقاااااء    بكل الحب .....♥



الاثنين، 4 مارس، 2013

الحلقه السادسه ...

كَبرت يآ أُمي ؛؛
وأصبحَ لِي أحباء يَرحَلون بلآ عَوده ولآ حَتى وَدآع !

















•´*•.¸( .khaled¸.• *´•,






لم تمر علي الليالي كعادتي تائهاً سارحاً وانما أتى الوقت الذي أصبحت فيه متيقظاً منصتاً لصوت بداخلي يشعرني وكأنني ملك هذه الدنيا وأنا فقط من علي تحرير عبيدها من ظلم استوطن مملكتي الا أنني غفلت فجأة عن أهم حلقه في هذه المسرحيه ولكنني أفقت في الوقت المناسب سمعتُ أحدهم يقول ...
- علينا كشف هذا الأمر وبحرفيه دقيقه جداً ...
فعلمت أنهم يحيكون مكيدة ضدنا وقد يعذبوننا للحصول على معلومات دقيقه ..
وأوقفتني نقطه وأنا مستغرق في التفكير ترى ماذا يقصدون ب" المدلل.."
بدت لي كلمة سر ولكن علي معرفه ذلك وفوراً , وهرعتُ دون  درايه مني   على  دفاتر تدويناتي     لدراستها  من جديد   كان  ضرباً  من  الجنون   بالنسبه   لي ولكنني  تعودت  على  ذلك   ....  حتى  أصبح  الفضول  يقتلني   لأعرف  المزيد  وولد   لي   شعوراً  لا أٍستطيع  وصفه  غير  أنني  شعرتُ  أنني  مسؤول كل المسؤوليه  أمام  نفسي  أولاً  وأنا  أتسااااءل   من هو  ذلك المدلل؟!




الى اللقااااء  بكل الحب  ...♥ 

السبت، 2 مارس، 2013

الحلقة الخامسه ...





وأثناء  انشغالي   في تدوين  ما أريد   طلبه  المرة  القادمة  فجأة   توقفت  ناظرااي   حتى  فتحت  فاااي  من هول   ما رأيت 
حين  سمعت  قهقهة   الجنود   الصهاينه      قتلني الفضول  لأعرف   ما الذي   يقومون  به    

فرأيتهم  من نافذة  صغيرة    يلعبون   " الشدة"  ولكن هذا  لا يهم  المهم  أنهم  يلعبونها    بهويانا   نعم  بالهويه الفلسطينيه   رمز الوجود  والبقاااء  
هوية  فلسطينيه  تُهااان  وأنا  في معتقلي  هذا 
جننت   للوهلة الأولى  وكذبتُ   عيناااي  ولكن عقلي  أمهلني  وقال لي:

تمهل  فهنااك المزيد   لتعرف   ..  وربما   تلك النافذة  تفضح    خبايا   خلفها  وقد  أهملو ا   وجودها  ...

يوم  بعد  يوم   سمعتُ   قصصهم   وألاعيبهم   تروى  على  مسمعي    فأخذتُ  بتدوينها   ودراستها  نعم  درستها   حتى   أفهم   شخصية    من أمامي   لأجد  نقاط  الضعف     ...

مرت  الأيام   , واستغربتُ   أني  تعرفتُ  على كل الأٍسرى  في  فترة  قصيرة  جداً   وهنا  لا حظت  أمراً   أن  أحدهم  يحاول الاقتراب   مني   وبدا   لي  شاذاً    ....
ولكنه  حاول  اقناعي  أنه  فلسطيني   مثلي    .. رغم   ذلك  لم أقتنع   وابتعدت   ولكنني  فكرت  في  أمره   ولولا  أنه  فلسطيني  لما  كان  بيننا اليوم    أسير  مثلنا   برغم  ذلك  لم أرتح  له  

ومن نافذتي  الصغيرة  كنت  أسترق السمع  ليلاً   وأستمع   لأحاديثهم    ولكنني   سمعت   صوتاً  أعرفه جيداً 

وأخذتُ  الليل   بطوله  ترى  صوت  من ؟  هذا  ؟  صوت  من ؟


ولكن   كل محاولاتي  بااااءت  بالفشل   ... حين   طلعت الشمس  من مخبأها   خرجتُ  الى الساحه  للتنظيف   كعادتنا  وردّ  علي   صاحب  الصوت   قائلاً  :
- صباح  الخير 

رفعتُ  رأسي  أسابق  النظرات   ...  وهمستُ   قهراً   ...- أوووه   تذكرت  ...

انه هذا  الشاذ  يشاركهم   اللعب  والقهقهات    حينها  فقط 
أعجبتني  فكرة  أن  يقترب  مني 

لأحقق  غاياتي   .....والي  اللقاء   بكل الحب  ...♥

الثلاثاء، 26 فبراير، 2013

الحلقة الرابعه ...

صورة: ‏يبقى حد متعرفوش،
تبتدوا تتكلموا، تعرفوا بعض أكتر، تتكلموا ليل نهار، يبتدي الكلام يقل، تسألوا أداء واجب، وبعدين يرجع تاني حد متعرفوش.

حــد حصـل معاه كــدا قبل كدا :( ؟

laaع‏



وفجأة في الليل   وبالأخص  في عمقه   تراءت  لي   كل الجميل  في هذه الحياة 

شعرت ُ   اشراقة الشمس  ليلاً    وأنفاسي   من  الراحة  مثقله  

حتى أنني   تمنيتُ  لو أستطيع   أن  أخلص   هذا العالم  كله   من الهموم  ,  هكذا  أتتني  طاقة  ايجابيه  تقول  وبعمق 

( أنت غداً  ....   شيء  رائع)


بدت  لي تلك الهمسه  غامضه   تحمل في طياتها الكثير ولكنها  أعجبتني  فأبيتُ  الا  أن أضعها   في   الفعل   لتصبح  سلوكي وعاداتي وكل  طموحاتي ...

نهضتُ   من  فراشي  ...   لأتوضأ  وصليتُ  ركعتين  ...   كانوا   يسمحون  لأهلي   بزياتي  في السجن  ومن الزيارة  الأولى 
وجدتُ   وجه  أمي  قلقاً   مشتاقاً  ...  لا أعرف   لماذا   لم  أتكلف   أو  أشعر   بها   فوجدتني  أقل ..

- أماااه  أريد كتباً  ...  فلا  وقت  لدي  ...

نظرت  الي أمي  ولكنني تداركت  أني  أخطأت  التعبير     فبدلاً   من أن  أسألأها  عن حالها   رأيتني   أسارع  في تحقيق هدفي 
وأنا الذي  كنتُ   خارج  تلك الزنزانه  لا مبالي  للوقت  وسعاتي  دوماً   معطله  ...

فسارعت ُ   بتصحيح   خطأي  قائلاً  :
- أعتذر ,,,  أماااه  ولكنني  مشوش  الفكر   حائر البال ....

ردت  علي  وقالت:
-  لا تقلق  بني  ...  لن أقطع  زيارتي   عنك  ...

في هذه اللحظة  بالذات  أعلنوا  أن  وقت الزيارة   قد  انتهى    ولكنني  صرخت   قائلاً  :

-  لا تنسي   الكتب  أماااه  ...  اووووووه  أخطأت  التعبير  ثانيه    بدلا  من  أو  أودعها  توديعاً  لائقاً   فكرت  فقط  في نفسي  وفي هذا  الطموح  الذي  ولد  بداخلي  ....  ولكن  نظرات  أمي  لي  كانت  تقول :

(تغير ابني ...وهذا كل  شيء  ...)


نظرت الى السقف  وأطلت النظر حتى أغمضتُ   عيني  ورأيتُ  تلك  الاشراقة    من جديد  

اشراقة  الشمس   ليلاً ..............والى اللقااااء ...♥بكل الحب

الحلقه الثالثه ..




نظرتُ الى السقف 
ثم 

نظرت الى الأرض
وتساءلت  أسأضحك   اليوم  في هذه الزنزانه 

ورأيتُ  الاجابة  أمامي تقرع  على جداري


ياهذا   ... ياهذا 

فقط  مد  يدك  لنلعب ونتسلى  قليلاً  ...

وقد  رأيته جهز  طاولة الشطرنج 
مخرجاً   يده  

وبدأ اللعب 

أثناء اللعب   تعرفنا على بعضنا 
وضحكنا كثيرا
وتحدثنا 
كثيراً  وكثيراً 

هزمته  في المرة  الأولى 
وهزمني  هو في الثانيه 

كل ذلك 
وأنا   لا أسمع الا  لصوته 

ولكنني  لم أراه 

هذا  رفيقي  في السجن   يقف  بيننا  جدار 
منعنا  من رؤية  بعضنا

ولكنه لم  يمنعنا  من متعة 
التعارف ... واللعب  .. والغمز

آآآآآآآه   أذكر هذا  اليوم 
وفي هذا  الظلام  ضحكت ...  نعم  ضحكت 
ضحكه  عميقه 

فخطرت  ببالي  فكرة 

نظرتُ  الى الجماداات   وصرختُ  أقول لها

لا لن تمنعيني  

وسأبني   سعادتي     هنا  وفي هذه  الزنزانه البائسه  .....


الى اللقاء ...♥